January 23, 2020

2100 तक तापमान 3.2 डिग्री बढ़ेगी: यूएन (According to UN global temperature will rise by 3.2 degrees)

संक्षेप में :

2100 तक औसतन तापमान में 3.2% बढ़ने की सम्भावन है। 2017 के मुकाबले 2018 में कार्बन उत्सर्जन ज्यादा ही रहा। इसमें भारत है 7 % जिम्मेदार।

जलवायु परिवर्तन यूएन के द्वारा बताये गए टॉप 5 खतरों में से एक है जिससे पूरा विश्व झूझ रहा है। लेकिन वैज्ञानिकों के लगातार चेतावनी और विश्व द्वारा पेरिस एग्रीमेंट (Paris Agreement ) में किये गए वादों के बावजूद 2018 के मुकाबले 2019 में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन (Carbon dioxide Emission)ज्यादा ही रहा। पिछले तीन सालों स्थिर रह कर उत्सर्जन 2017 में बढ़ी थी।

विभिन्न देशों के ग्लोबल एमिशन के आंकड़े कुछ इस प्रकार है – चीन 26.8% , अमेरिका 13.1% , यूरोप 9%, भारत 7% और रूस 4.6% ।

रिपोर्ट में क्या बातें कहीं गयी

यूएन ने रिपोर्ट बताते हुए इसकी भी चेतावनी दी की 2100 तक तापमान में औसतन 3.2 डिग्री वृद्धि होगी जिसके परिणाम भयानक हो सकते है। पिछले दशक में कार्बन उत्सर्जन में हर साल 1.5% वृद्धि हुई है। इसके जिम्मेदार ज्यादातर विकसित देश (Developed Nations) ही है। आगे आने वाली गंभीर स्तिथि को काबू करने के लिए कार्बन उत्सर्जन को 7 % प्रति वर्ष के दर से घटने की बात भी रिपोर्ट में कही गयी। अगर जल्दी कदम नहीं उठाये गए तो 2030 के बाद इसे हांसिल करना असंभव हो जायेगा। 2015 में 195 देशों ने साथ मिलकर इसपर काम करने का फैसल किया था। 2100 तक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री के अंदर रखने का प्रयाश करने की बात की थी।

अब जलवायु परिवर्तन कोई भविष्य की बात नहीं रह गयी। विश्व का एक छोर अमेरिका में जहाँ तापमान -50 डिग्री जा रहा है वहीँ दूसरा छोर ऑस्ट्रल 50 डिग्री का भीषण गर्मी अनुभव कर रहा है। 1850 से 1900 के समय ही तापमान प्रति वर्षा औसतन 1.1 डिग्री के हिसाब से बढ़ रही थी जबकि वह दौर औद्योगीकरण से पहले का था। लेकिन अब औद्योगीकरण इतना बढ़ते जा रहा है की इसपर कब लगाम लगेगा कुछ कहा नहीं जा सकता। कहीं ऐसा न हो की हमरा विकास ही हमारे अंत का कारण बन जाये।

एक या दो डिग्री वृद्धि भी क्यों है खतनाक

धरती के तापमान को हम अपने शरीर के तापमान जैसा समाझ सकते है। हमारे शरीर एक सामान्य तापमान होता है और एक दो डिग्री भी बढ़ जाये तोह हमें डॉक्टर के पास जाना पड़ता है। इसीतरह धरती के तापमान में 2.1 डिग्री वृद्धि भी चिंतनीय बात है। जिसके बहुत भयावह परिणाम होने की शुरुआत हो चुकी है।

अब यह भी देखा जा रहा है की अभी के जलवायु परिवर्तन के चलते आने वाले भीषण गर्मी और सूखा के कारण चावल , गेंहूं, सोयाबीन जैसे फसलों का नुकसान हो रहा है। इससे खाद्य सामग्री के कीमतों में वृद्धि और इसकी कमी की स्तिथि में कमी हो रही है। उदाहरणतः प्याज की कीमतों में उछाल से कोई अनजान नहीं है।

व्यक्तिगत रूप से क्या कर सकतें है

यह समस्या हम सबकी है और इसका समाधान में भी हम सबकी हिस्सेदारी जरुरी है। सबसे पहले तो हमें हमारे रहन सहन , खान पान इत्यादि के तरीकों का कार्बन फुटप्रिंट का ध्यान रखना होगा। जैसे की मांसाहारी भोजन के ज्यादा कार्बन फुटप्रिंट होते हैं। घरों में एनर्जी एफिसिएंट मशीनो का उपयोग कर सकते हैं। कार और मोटरसाइकिल के बदले साइकिल का इस्तेमाल अच्छा होगा। सोलर पैनल से अपने घरों के बिजली की की आपूर्ति कर सकते हैं। ऐसे अनेक तरीकों से हम जलवायु परिवर्तन को रोकने में व्यक्तिगत रूप से मदद कर सकते हैं।

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